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हम में से एक जैसी कोई भी चीज नहीं होती है।  हम सृष्टि की रचना का एक हिस्सा होते हैं।  जो एक मामूली कण के समान है।  हम हम बने रहे। उसी में हमारा कल्याण है। प्रत्येक व्यक्ति में अपनी एक विशेषता होती है। शेर और बकरी के प्रवृत्ति अलग-अलग होती है।  दोनों का लक्ष्य भी अलग होता है। जहां शेर की नजर मांस पर होती है। वही बकरी की नजर हरी घास पर होती है। शेर का शेर बने रहना और बकरी का बकरी बने रहने में ही विकास है। शेर अगर अगर बकरी बनना चाहे या बकरी अगर शेर बनना चाहे ,यह उनके लिए संभव नहीं है। वह स्वयं प्राप्त शेरपन या बकरी  पन त्याग नहीं सकते है। इसके लिए उसे पूरा शरीर त्यागना पड़ेगा , और नया जन्म ग्रहण करना पड़ेगा।  पर इस जन्म में जीने के लिए शेर को शेर और बकरी को बकरी ही बने रहना पड़ेगा।  इसी प्रकार मनुष्य के लिए भी दूसरे की नकल करना व्यर्थ है। दूसरे को देखकर दूसरा बनने की कोशिश नहीं करना चाहिए।  दूसरों के जीवन में ताका झांकी विकास की ओर नहीं ,पतन की ओर ले जाती है।  मनुष्य को अपने कल्याण के लिए , जो हमें मिले इस चोले में खुश रहने का प्रयास करना चाहिए ,और अपनी पहचान स्वयं की स्वयं से करनी चाहिए।

लेखिका :कंचन ठाकुर

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